रावण का अहंकार और बुज़ुर्ग की चेतावनी
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ये कथा शायद आपने पहले कभी ना सुना हो, बहुत अच्छी और अनसुनी कथा है, तो इसे पूरा जरूर सुनना, लंका पति रावण जब पूरे विश्व मे, दिग्विजय प्राप्त कर चुका था, सभी देवताओ को भी हरा दिया था, अपने बल से,
ऐसे ही रावण एक दिन, अपनी सभा मे बैठा था, और अपनी जांघ को थापते हुए बोला, मुझे लगता है, पूरे त्रिलोक मे, चौदह भवन मे, मुझसे ज्यादा बलशाली कोई नही है, मैने अपने बल से सब को जीत लिया,
उसी सभा मे एक बुजुर्ग मौजूद था, जिसने रावण के इस अहंकार भरे शब्दो को सुना, तो उससे रहा ना गया, अपने सिंघासन से खडा हुआ, और रावण से कहने लगा, महाराज आप निश्चित ही बलशाली है, लेकिन हम आपसे प्रार्थना करते है,
कभी अवध नरेश महाराज रघु के यहा मत जाइएगा, कथा थोडी पिछली है, जब अवध मे रघु महाराज विराजते थे, रावण को तो पहले से ही, अपने बल पर अहंकार था, जैसे ही बुजुर्ग के मुंह से ये शब्द सुना,
तो मानो उसका खून खौल गया हो, तभी रावण बोला, आपने मुझे ललकारा है, मुझे चेतावनी दी है, अब तो अवश्य जाऊंगा, तभी बुजुर्ग ने फिर बोला, महाराज मै फिर से आपसे अनुरोध करता हूं, आप मत जाइए, वो बहुत बलशाली है,
रावण बोला, अरे तुम कैसी बात कर रहे हो, मैने सब को हरा दिया है, त्रिभुवन मे मेरा सामना करने का साहस किसी मे नही है, सब हारे पडे है, ये रघु क्या चीज है, जब बुजुर्ग के बार बार कहने पर रावण नही माना,
तो बुजुर्ग बोला, महाराज हम आपसे प्रार्थना करते है, की आप एक बार विद्यार्थी बनकर देखने जाओ, फिर आपको लगे, कि मै युद्ध कर सकता हूं, तो करना, रावण ने कहा ठीक है, एक बार मै देख कर आता हूं,
आखिर उनमे कितना बल है, रावण ने साधारण से वस्त्र धारण किया, और पहुंच गया अवध, उस समय रघु महाराज सरयू के किनारे बैठकर, संध्या कर रहे थे, संध्या मे एक निधान होता है, की हाथ मे जल लेकर, अघमर्षण किया जाता है,
और बायां हाथ को उठाकर, उसे पीछे की तरफ डाला जाता है, ऐसा माना जाता है, अगर वह जल किसी वृक्ष मे गिर जाए, तो वह वृक्ष सूख जाता है, इतना बलशाली होता है अघमर्षण का जल, तो जब रघु महाराज अघमर्षण का जल सिद्ध कर रहे थे,
तो अचानक उनके मन मे चिंतन आया, की दक्षिण भारत मे एक ब्राह्मण के घर मे, गौ माता बंधी हुई है, उस गौ माता पर एक शेर आक्रमण कर रहा है, और वो ब्राह्मण त्राहीमाम त्राहीमाम कहके चिल्ला रहा है, अरे कोई बचाओ बचाओ,
तभी रघु महाराज ने चिंतन किया, उस अघमर्षण के जल को, शेर का चिंतन करके, पीछे फेंका, रघु महाराज ने अयोध्या मे बैठकर फेंका, और दक्षिण मे उस गौशाला मे, उस शेर का वध हो गया, ये थे महाराज रघु, वही पास ही खडा रावण,
जिसने ये सारी क्रिया को देखा, वह तुरंत हाथ जोडकर दौडकर उनके पास गया, और बोला महाराज आपने अभी अभी कुछ किया है, ये जो अघमर्षण का जल फेंका है, और मैने जो विस्फोट की आवाज सुनी, उससे ऐसा प्रतीत होता है, की आपने किसी का वध किया है,
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रघु जी ने टालना चाहा, लेकिन रावण जिद कर रहा था, महाराज आप बताएं आखिर किया क्या था, फिर रघु जी ने बताया, की दक्षिण भारत मे एक गौशाला है, वहा आज एक गरीब ब्राह्मण को पहरेदारी मे रखा गया था,
लेकिन उसकी कुछ लापरवाही के कारण, उस गौशाला मे एक शेर घुस गया था, गायो की जान के साथ साथ, उस गरीब ब्राह्मण की भी जान का खतरा था, तो मैने उस शेर को मार दिया, रावण ये सब सुन सन्न रह गया, रावण बोला,
महाराज ये तो मैने पहली बार देखा है, ऐसा योगबल, की यहा बैठे बैठे किसी को भी मार देते हो, तभी रावण को अपने सभा के, उस बुजुर्ग की बात याद आई, की इनसे युद्ध करना सरल नही है, अब रावण रघु जी का शिष्य बन गया,
और रघु महाराज से विद्या सीखने लगा, ऐसे ही एक दिन, रावण रघु महाराज के पीछे पड गया, की आप मेरी लंका चलो, आप मेरे गुरु है, आप एक बार मेरी लंका मे पैर पधरा दो, तभी रघु महाराज ने पास ही पडे, एक कुसा को उठाया,
और सरयू की भूमि पर कुछ बनाने लगे, फिर थोडी देर बाद बोले, ये तुम्हारा घर है, ये तुम्हारा भवन है, यहा मंदोदरी रहती है, यहा कुम्भकरण सोता है, यहा पर विभीषण रहता है, आदि आदि उन्होने सब के बारे मे, वही बैठे बैठे बता दिया,
रावण हैरान हो गया, महाराज आपको कैसे पता, आप कभी लंका गए हो, नही नही मै नही गया हूं, लेकिन यहा मुझे सब दिखता है, और सुनो यहा इस द्वार पर लंकिनी नाम की राक्षसी रहती है, जो वहा नित्य पहरा दिया करती है,
सब सुनने के बाद रावण बोला, महाराज आप तो महान है, लेकिन रावण ठहरा फिर अपनी जिद मे, बोला महाराज आप एक बार मेरी लंका चलो, जब रावण जिद कर रहा था, उसी समय रघु महाराज का, गलती से एक हाथ, उस नक्से के एक कोने मे पड गया,
अरे अनर्थ हो गया, रावण बोला, महाराज क्या हो गया, अरे मेरा गलती से हाथ नक्से मे लग गया, तो इससे क्या हो गया, रघु महाराज बोले, इतना तुम्हारे लंका का हिस्सा समुद्र मे डूब गया, रावण को यकीन नही हो रहा था,
की एक मानचित्र से वास्तविक हिस्सा कैसे टूट सकता है, रावण तुरंत वहा से भागकर अपनी लंका पहुंचा, तो उसने देखा, तो वास्तव मे उतना हिस्सा पानी मे डूब रहा था, सभी लोग वहा उपस्थित हो चुके थे,
रावण ने अपने सैनिको से पूछा, ये कैसे हुआ, महाराज अचानक एक आवाज आई, और इतना हिस्सा पानी मे डूबने लगा, रावण बोला ये रघु कोई साधारण नही है, युद्ध करना तो दूर की बात है, ये कही भी कुछ भी कर सकते है,
ये मुझे यूं ही मार सकते है, तब रावण के मन मे एक बात खटकने लगी, आखिर इतना कुछ कैसे कर लेते है, इसके पीछे कारण क्या है, तब उन्हे एक संत ने बताया, रघु महाराज स्वयं ही वेदक्य है, स्वयं भी गुरु है,
पर उनसे भी ज्यादा उनकी पत्नी, वह संतो की सेवा करती है, गुरूजनो की सेवा करती है, और पतीव्रता धर्म का पालन करती है, इनकी पत्नी के पतीव्रता धर्म का बल, रघु महाराज को मिला हुआ है,
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रावण को ये तो पता चल गया, की इनमे इतनी शक्ति का राज क्या है, अब वह कहने लगा, मुझे यह बताओ, इनको मारा कैसे जा सकता है, संत ने बताया, की जब उनकी पत्नी का, पतीव्रता धर्म टूटेगा, तभी आप इनके ऊपर आक्रमण कर सकते है, रावण बोला, हम राक्षस है, इतना तो कर ही सकते है, हम रघु का रूप धारण करके जाएंगे, और इनकी पत्नी का पतीव्रता धर्म तोड देंगे,
रावण अपनी योजना को साकार करने के लिए, सही मौके का इंतजार करने लगा, उसे अच्छे से ग्यात था, की रघु अयोध्या मे उपस्थित है, तो मै कुछ नही कर सकता, ऐसे ही एक दिन रघु महाराज किसी काम से बाहर गए थे, तभी रावण ने रघु का रूप धारण किया, और तुरंत अयोध्या पहुंच गया, जैसे ही भवन मे प्रवेश किया,
और जाकर कक्ष मे सिंघासन पर बैठा, रघु जी की पत्नी ने देखते ही, उनकी चाल ढाल और नेत्रो से समझ गई थी, की ये रघु महाराज नही है, ये कोई रूप धारण करके आया है, तुरंत सैनिको को आदेश दिया, इसे तत्काल बंदी बना लो, रावण बोला, अरे तुम मुझे बंदी क्यो बनवा रही हो, मै रघु हूं, पत्नी बोली, रघु महाराज जब भी महल मे प्रवेश करते है, तो अयोध्या की रज को, अपने माथे पर लगाकर आते है,
और तुम्हारे चलने ढलने और बोलने से, सब पता चल रहा है, की तुम रघु नही हो, रावण को बंदी बना लिया, कुछ समय बाद रघु महाराज वापिस आए, और उन्हे जैसे ही पता चला, की मेरे शिष्य रावण ने ऐसा किया, रावण को अपने सामने बांध दिया, और बोले, लाओ मेरा धनुष बाण, आज मै इसका वध करता हूं, जैसे ही उन्होंने बाण को धनुष की प्रत्यंचा पर रखा,
तभी ब्रह्मा जी प्रकट हो गए, भगवान आप ठाकुर जी की लीला को, क्यो खतम कर रहे हो, आपकी भक्ति और आपकी गृहणी की भक्ति से, ठाकुर जी इतने प्रसन्न है, की त्रेतायुग मे जो उनका अवतार होगा, वो रघु महाराज के वंस मे ही आएंगे, इसलिए आप इसका वध ना करे, उन्होंने कहा है, की जिस बाण से आप इसे मार रहे हो, उसे ब्रह्मा जी रख ले, त्रेतायुग मे, मै उसी बाण से रावण को मारूंगा,
इसके बाद रघु महाराज ने, अपने क्रोध को सांत किया, और ब्रह्मा जी की बात को मान लिया, फिर उस बाण को ब्रह्मा जी ने, अपने पास रख लिया, लेकिन यहा रावण बहुत परेशान हो रहा था, की मेरी मृत्यु त्रेतायुग मे उस बाण से हो सकती है, तो रावण ने ब्रह्मा जी की तपस्या करने का निश्चय किया, वह एक पर्वत के खंड पर गया,
और ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करने लगा, इधर रघु महाराज की ख्याति इतनी बढ चुकी थी, की पूरे विश्व मे उनके धर्म और न्याय से, भली भांति परिचित थे, वह एक धर्मात्मा थे, समस्त पृथ्वी पर विजय प्राप्त करने के बाद, ऐसे ही एक बार, अपने अदम्य शौर्य का प्रतीक, और धर्म की स्थापना हेतु, उन्होने एक महान यज्ञ करने का निश्चय किया,
महाराज रघु ने तुरंत अपने श्रेष्ठ दूतों को, राज्य के चारो कोनो मे भेजा, घोषणा कराई गई, कि अयोध्या मे शीघ्र ही 'विश्वजीत यज्ञ' का आयोजन किया जाएगा, और यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद, एक विशाल 'महान दान' का आयोजन होगा,
यग्य के लिए देश-विदेश से विद्वान, ब्राह्मण, रिषि, दरिद्र जन, और अन्य याचक अयोध्या की ओर उमड पड़े, हर व्यक्ति रघु महाराज के इस अभूतपूर्व त्याग को देखना, और उनके करुणा भरे हाथो से दान प्राप्त करना चाहता था, यह सिर्फ दान नही था, यह धर्म और त्याग की पराकाष्ठा थी, जिसके साक्षी बनने की इच्छा, हर किसी के मन मे थी।
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क्या पता महाराज से हमे, क्या दान मे मिल जाए, लालच के कारण यग्य मे बहुत लोग आए, जैसे ही यग्य सफल हुआ, तो रघु महाराज ने अपने कहे अनुसार वचन से, सभी को दान दिया,
लेकिन इतनी संख्या मे लोग मौजूद थे, की दान देते देते अंत मे, उनके पास कीमती समान कुछ नही बचा, लेकिन सभी को दान मिल चुका था,
विश्वजीत यज्ञ समाप्त हो चुका है, यग्य वेदी की अग्नि अब शांत है, महाराज रघु अपने राजसी वस्त्रो को त्यागकर, साधारण वेश मे, मिट्टी के पात्रो के बीच बैठे है, उनका खजाना पूरी तरह खाली है, क्योकि उन्होने अपना समस्त धन दान कर दिया है, बाहर खडी प्रजा और ब्राह्मण अभी भी, रघु महाराज की जय-जयकार कर रहे है,
उनके अभूतपूर्व त्याग की प्रशंसा कर रहे है, तभी यज्ञ मंडप के द्वार पर, एक युवा तेजस्वी रिषि कुमार दिखाई देते है, जिनका नाम कौत्स था, रघु महाराज ने आदरपूर्वक खडे होकर, स्वागतम् हे तपस्वी, मै रघु आपका अभिनंदन करता हूं, यह रघुकुल आज धन्य हुआ, जो आपने पधारने का कष्ट किया, आप किस प्रयोजन से आए है,
कौत्स रिषि ने आखो मे निराशा के साथ, चारो तरफ देखते है, जहा उन्हे सोने-चांदी के ढेर की उम्मीद थी, वहा सिर्फ मिट्टी के बर्तन, और शांत वेदी दिखती है, संकोचवश वह बिना कुछ कहे, वापस मुड़ने लगते है, रघु महाराज उनके मन को भांप लेते है, क्षमा करे रिषीवर, आप निराश लौट रहे है, रघुवंश मे याचक का अपमान नही होता,
कृपया मुझे अपने हृदय की बात बताने का अवसर दे, रघु महाराज के बार-बार आग्रह पर, कोत्स ऋषि ने अंततह, संकोच त्यागकर अपना दुख भरा वृत्तांत सुनाया, हे महाराज, मै बचपन से ही गुरुदेव वरतन्तु की शरण मे रहा, मैने सभी शास्त्रो और वेदो का गूढ़ ग्यान प्राप्त किया, और आज मै कुछ योग्य बन पाया हूं, जब मेरी दीक्षा पूरी हुई,
तो मैने गुरुदेव से पूछा, मै आपको क्या दक्षिणा दूं, गुरूदेव ने दक्षिणा ना देने को कहा, लेकिन गुरु दीक्षा लेने पर, दक्षिणा देने का नियम होता है, तो मै उनसे जिद करने लगा, की कृपया आप बताए, आपको क्या चाहिए, मेरे बार-बार पूछने पर, गुरुदेव ने कहा, यदि तुम कुछ देना ही चाहते हो, तो मुझे ग्यारह हजार स्वर्ण मुद्राए दे दो, महाराज मै दरिद्र हूं,
मेरे पास एक कौडी भी नही थी, मैने आपके दानयग्य की चर्चा सुनी, और सोचा कि यहा मेरी आशा पूरी होगी, किंतु यहा आकर मैने देखा, कि आप तो मुझसे भी बडे दानी है, आपने अपना सब कुछ दान कर दिया है, यह देखकर मै स्वयं को दुर्भाग्यशाली मानकर लौट रहा था, महाराज रघु ने कौत्स की बात धैर्यपूर्वक सुनी, उनके चेहरे पर दुख के स्थान पर, अटल संकल्प का तेज आ गया,
हे रिषि कुमार, यह आपने कैसे समझ लिया, कि मेरे पास कुछ नही है, रघु के पास जितना भी धन था, वह सब दान मे दे दिया, पर जब तक मेरे पास मेरा धनुष-बाण है, तब तक सब कुछ है, रघु महाराज ने आश्वासन देते हुए कहा, आप चिंता मत करे, मेरा वचन है, आपको आपकी गुरुदक्षिणा अवश्य मिलेगी,
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मै अभी धन के देवता कुबेर से बात करता हूं, वह अवश्य तुम्हारी सहायता करेंगे, उन्होने तुरंत एक पत्र लिखा, अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट रघु, याचक कौत्स के गुरुदक्षिणा हेतु, ग्यारह हजार स्वर्ण मुद्राओ की याचना करते है,
कृपया आप इस धन को अविलंब देने का कष्ट करे, रघु ने उस पत्र को अपने दिव्य बाण से बांधा, और उसे शक्ति के साथ कुबेर की नगरी, अलकापुरी की दिशा मे भेजा, कुछ ही क्षणों मे, वही बाण कुबेर का उपहास भरा उत्तर लेकर लौटा,
कुबेर ने पत्र मे लिखा, क्या आप यहा कोई धन रख गए थे, जो अब मांग रहे हो, मेरे कोष पर केवल मेरा अधिकार है, रघु महाराज ने जैसे ही वह अपमानजनक उत्तर पढ़ा, उनके क्षत्रिय क्रोध की सीमा न रही,
यह केवल धन के लिए अस्वीकृति नही थी, बल्कि एक महान चक्रवर्ती सम्राट, और श्रेष्ठ दानी के सम्मान पर प्रश्न था, फिर उन्होंने याचक रिषी कौत्स को देखा, जो आशा और निराशा के बीच खडे थे, तभी रघु महाराज बोले, हे रिषीवर, तुम चिंता मत करो,
यह रघु कुल का नियम है, कि याचक को खाली हाथ नही लौटाया जाता, मेरे धनुष-बाण मे अब भी इतना सामर्थ्य है, कि मै तुम्हारे गुरुदक्षिणा की व्यवस्था कर सकूं। कुबेर ने मेरे बाहुबल को चुनौती दी है,
और मै इस चुनौती को स्वीकार करता हूं, रघु कुल का धन भले ही समाप्त हो गया हो, पर गौरव और पराक्रम अभी भी शेष है, उन्होने तुरंत अपने सैनिको को आदेश दिया, कि वे युद्ध की तैयारी करे, रघु महाराज का संकल्प था,
या तो वह युद्ध करके, कुबेर का समस्त धन कोष जीत लेंगे, या फिर कुबेर से उतना धन लेकर आएंगे, जितना उनके याचक को चाहिए, महाराज रघु का यह संकल्प ब्रह्मांड मे गूंज उठा। धन के स्वामी कुबेर, जो देवराज इंद्र के मित्र भी थे,
उन्होंने इंद्र तक यह समाचार पहुंचाया, कि दिग्विजयी सम्राट रघु, उन पर आक्रमण की तैयारी कर रहे है, कुबेर को भली-भांति ग्यात था, महाराज रघु ने अभी-अभी विश्वजीत यज्ञ पूरा किया है, जिससे उनका पुण्यबल शिखर पर है,
रघु इतने पराक्रमी है, कि उन्होने देवराज इंद्र को भी युद्ध मे परास्त किया है, उनका उद्देश्य स्वयं के लिए धन प्राप्त करना नही, बल्कि एक याचक का वचन पूरा करना है, और धर्म के लिए किए गए इस युद्ध मे, उन्हे हराना असंभव है,
कुबेर ने तुरंत अपनी गलती महसूस की, और रघु के पराक्रम और धर्मनिष्ठा के आगे झुक गए, उन्होने शीघ्र ही युद्ध टालने का निर्णय लिया, जब रघु महाराज अपने धनुष पर बाण चढाकर, कुबेर की नगरी, अलकापुरी की ओर प्रस्थान करने ही वाले थे,
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तभी उनके राजकोष और भंडार गृहो मे, स्वर्ण मुद्राओ की जोरदार वर्षा होने लगी, यह कुबेर की ओर से भेजी गई, दैवीय धन वर्षा थी, रघु महाराज के कोष गृह, क्षण भर मे सोने के सिक्को से भर गए, वह धन अत्यधिक था, उन्हे केवल ग्यारह हजार स्वर्ण मुद्राओ की आवश्यकता थी, लेकिन कुबेर ने उससे कई गुना अधिक, धन बरसा दिया था,
फिर रघु महाराज ने उस याचक कौत्स को बुलाया, और कहा, हे रिसीवर, देखो तुम्हारे गुरु की दक्षिणा आ गई है, कुबेर ने युद्ध से पहले ही हार मान ली है, तुम अपनी आवश्यकता के अनुसार स्वर्ण मुद्राएँ ले लो, लेकिन कौत्स ने देखा, कि रघु महाराज का राजकोष, अब फिर से धन से भरा हुआ था, कौत्स ने विनम्रता से केवल ग्यारह हजार मुद्राएं ली, और बाकी धन को हाथ भी नही लगाया,
क्योकि उसे केवल अपनी गुरुदक्षिणा पूरी करनी थी, इस घटना ने सिद्ध कर दिया था, कि सच्चा दानी वह नही, जो धन होने पर दान करे, बल्कि वह है, जो अपने संकल्प और पुरुषार्थ से दान के लिए, धन का सृजन कर दे, यह कहानी महाराज रघु को अजर-अमर बना देती है, इस लिए रामायण जैसे महाकाव्य में एक लाइन वर्णित है,
रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाए पर बचन न जाई, यही से इनके पूरे वंस को, रघुकुल के नाम से जाना जाने लगा, जब रघु महाराज ने सम्पूर्ण धन दान दे दिया, दान के बाद, रघु महाराज ने राजकाज तो त्याग दिया,
परन्तु गृहस्थ जीवन का धर्म निभाना बाकी था, उनकी पत्नी सुधर्मा, इन्हें कुछ ग्रंथों में सुधक्षिणा रानी भी कहा गया है,
जो अत्यंत पतिव्रता और तेजस्विनी थी, रघु ने ब्रह्मचर्य और यज्ञ-शक्ति से शुद्ध होकर, देवताओ के आशीर्वाद से पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। जो एक पुत्रेष्टि यज्ञ था, यह वही यग्य है, जो आगे चलकर राजा दशरथ ने किया था, रघु महाराज की पत्नी, अत्यंत पतिव्रता और तेजस्विनी थी, उनके संयुक्त यज्ञबल, तपबल, ब्रह्मचर्यबल से जब यज्ञ सम्पन्न हुआ,
तो देवताओ ने वरदान दिया, हे रघु, तुम्हारा कुल अमर रहेगा, तुम्हारे घर दिव्य पुत्र का जन्म होगा, जो आगे चलकर अज के नाम से प्रसिद्ध होगा, समय अनुसार रानी सुधक्षिणा गर्भवती हुई, और फिर एक तेजस्वी पुत्र पैदा हुआ, अज का पालन-पोषण ठीक उसी प्रकार हुआ, जैसे रघु का हुआ था, धर्म, शस्त्र-ज्ञान और नीति मे निपुणता,
अज ने गुरुकुल मे रहकर सभी वेदों, शास्त्रों और युद्ध कलाओं का भी ज्ञान प्राप्त किया। वे अपने पिता की तरह महान धनुर्धर और वीर योद्धा बने, जब अज अपने युवा अवस्था मे पहुंचे, महाराज अज की कहानी का, सबसे महत्वपूर्ण और भावुक प्रसंग, उनका विवाह है, जो उनकी निष्ठा और प्रेम की गहराई को दर्शाता है,
जब अज की भी कीर्ति चारो दिशाओ मे फैलने लगी, ठीक उसी समय, विदर्भ राज की बहन, इंदुमति का स्वयंवर रचा गया, विदर्भ राज भी चाहते थे, की अज भी उस स्वयंवर मे पधारे, लेकिन फिर उन्होंने सोचा, की सिर्फ स्वयंवर का संदेश दिया जाएगा, तो महाराज रघु, जो कि चक्रवर्ती सम्राट है, वो अपने पुत्र को, मेरे यहा नही भेजेंगे,
इसलिए विदर्भ राज ने, अपने मंत्री को एक खास संदेश के साथ, महाराज रघु के पास भेजा, उस संदेश मे विदर्भ राज ने लिखा था, की महाराज मै चाहता हूं, की मेरी बेटी के स्वयंवर मे आपका पुत्र, विषेश तौर पर, विषेश अतिधि के रूप मे भाग ले, जब राजा रघु ने, अपने पुत्र के सामने यह प्रस्ताव रखा, तो अज ने इस बात को स्वीकार कर लिया,
क्योकि उन्होने भी सुन रखा था, की इंदुमति धरती की सबसे सुंदर स्त्री है, अज भी चाहते थे, की इंदुमति का विवाह उनके साथ हो, लेकिन यह स्वयंवर की शर्त थी, यहा दो राजाओं के मन से विवाह नही होना था, यहा पर स्त्री अपना पती, स्वयं चुनने वाली थी, अज ने अपनी सेना के साथ, विदर्भ नरेश के राज्य की ओर प्रस्थान किया,
चलते चलते संध्या होने को आई, और अज की सेना भी, थकान का अनुभव करने लगी, उन्होने अपनी सेना के साथ, नर्मदा नदी के तट पर पडाव डाला, उस समय नर्मदा नदी पर, एक जंगली हाथी स्नान कर रहा था, जब राजा के हाथियों को उसने देखा, तो उनकी तरफ दौड़ पडा, पूरी सेना मे भगदड़ मच गई, महावतों के बस मे हाथी नही हो रहा था,
सभी सेना राजकुमार अज को पुकारने लगी, इसके बाद अज उस हाथी के सामने आए, अज चाहते तो उस हाथी को मार भी सकते थे, लेकिन शास्त्रो मे लिखा है, बेवजह किसी जीव को नही मारना चाहिए, इसलिए अज ने, एक अपेक्षाकृत कम प्रभाव वाला बाण उठाया, ताकि इस हाथी को थोडी सी चोट दी जाए, और यह भागकर जंगल मे चला जाए,
लेकिन उस बाण के लगते ही, वह हाथी अदृश्य हो गया, और वहा पर एक गंधर्व प्रकट हुआ, गंधर्व ने बताया, की हे राजकुमार, मे प्रियदर्शन नामक गंधर्व का पुत्र, प्रियवंबद हूं, एक बार मैने जवानी मे, रिषी मतंग की अवहेलना कर दी थी, इसलिए उन्होंने श्राप दिया, की मै जंगली हाथी बन जाऊंगा, जब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ,
तो मैने रिसीवर से बहुत विनती की, तो उन्होंने कहा था, की राजकुमार अज के किसी भी हथियार के, शरीर मे स्पर्श होते ही, मै श्राप से मुक्त हो जाऊंगा, अज आपकी कृपा से आज मै मुक्त हो पाया हूं, मै चाहता हूं की हम दोनों मित्र बन जाए, अज ने उस गंधर्व की मित्रता को स्वीकार कर लिया, बदले मे उस गंधर्व ने, राजकुमार अज को एक ऐसा हथियार प्रदान किया,
जिसके संचालन से, शत्रु पक्ष के सभी सैनिक, उस हथियार से सम्मोहित हो जाते थे, और फिर उनसे, शस्त्र उठाए नही उठता था, अज ने खुशी पूर्वक उस हथियार को स्वीकार कर लिया,
अगले दिन उनकी सेना, विदर्भ नरेश के राज्य की ओर प्रस्थान किया, वहा पहुंचने पर, विदर्भ नरेश ने, राजकुमार अज का बहुत ही अच्छे से स्वागत किया,
अज की सोभा, अन्य सभी राजाओ से अद्भुत और निराली थी, उनका आसन भी सभी एक अलग और विषेश था, एक प्रकार से तय ही था, की इंदुमति अज से ही विवाह करेगी, लेकिन यहा पर इंदुमति के चयन का प्रश्न था,
जब स्वयंबर का समय हुआ, तो इन्दूमती एक खूबसूरत फूलो की माला लेकर, अपनी कुछ सखियो के साथ, वहा पधारी, पहले उसने एक नजर उठाकर, सभी राजकुमार और राजाओ को देखा, लेकिन उसकी नजर जैसे ही,
राजकुमार अज पर पडी, तो वह उनपर मोहित हो गई थी, जो उनकी सहेली थी, वो उसकी खास सहेली, और उसकी सलाहकार भी थी, वह सखी बारी बारी से, सभी राजाओ का परिचय करा रही थी,
और उनके बुद्धि कौशल से भी, रूबरू करा रही थी, सभी को इन्दूमती सुन रही थी, लेकिन माला किसी को नही पहनाया, लेकिन जब इन्दूमती अज के समीप पहुंची, तो उसकी सखी ने, दोनो के हाव भाव को देखकर,
अनुमान लगा लिया, की इन्दूमति अज से ही विवाह करना चाहती है, इस पर सखी ने, हंसी ठिठोली करते हुए कहा, की यह कोई बडे राजकुमार नही है, इनके पिता बडे राजा है,
आप इनसे विवाह मत कीजिए, ये तो जब राजा बनेंगे, तब राजा बनेंगे, इन्दूमती इतनी भरी सभा मे, प्रेम का प्रदर्शन नही करना चाहती थी, इसलिए उसने शांत, और एक प्रेम आसा को दिखाते हुए, अपनी सखी की ओर देखा, सखी राजकुमारी की मनसा समझती थी,
वह तो हंसी ठिठोली कर रही थी, अंततह इन्दूमती के आदेश पर वह सखी ने, इंदुमति का हाथ पकडकर, वरमाला राजकुमार अज के गले मे डलवा दिया,
इसके बाद अज और इन्दूमती, एक दूसरे के हुए, इधर स्वयंबर मे अन्य राजा पधारे थे, उन्हे यह विवाह रास नही आया, क्योकि यह तो उनकी हार थी, लेकिन वह विदर्भ नरेश के यहा, अतिथि बनकर आए थे,
इसलिए उनके राज्य मे कुछ करना उचित नही समझा, लेकिन जिस रास्ते से अज लौटने वाले थे, सभी राजाओ ने सम्मिलित होकर, अपनी सेना के साथ, एक घेरा डाल दिया, इधर विधि विधान से विवाह करने के बाद,
अज अपनी पत्नी इन्दूमती के साथ, अयोध्या को लौटने लगे, लेकिन जैसे ही विदर्भ नरेश की सीमा को पार किया, और कुछ ही आगे, उन राजाओ की सेना ने, अज का रास्ता रोक लिया, अज कुछ समझ पाते,
इससे पहले ही विपक्ष के राजाओं ने, हमला बोल दिया, लेकिन अज भी रण कौशल से भली भाती परिचित थे, लेकिन इधर अज की छोटी सी सेना थी, और उधर सभी राजाओ की सम्मिलित बडी सेना थी, लेकिन राजकुमार अज का रण कौशल अद्भुत था, उनकी छोटी सी सेना ही, उनपर भारी पडने लगी,
जब राजाओ ने देखा, की हम एक एक करके, अज का सामना नही कर सकते है, तो उन्होने नीति के विरुद्ध का युद्ध किया, वे सब एक साथ मिलकर, अज को मारने के लिए दौडे, अज को चारो तरफ से घेर लिया, और एक ही साथ सभी ने,
इतने अस्त्र शस्त्र से वार किया, की उनका रथ अस्त्रो से ढक गया, केवल उनकी उची पताका का, कुछ भाग दिख रहा था, जिससे उनके सैनिको को पता चल रहा था, की अज कहा पर है, लेकिन अज ने अपने पराक्रम से, सभी अस्त्रो को निरस्त्र कर दिया, और गंधर्व के द्वारा दिए गए, उस सम्मोहन के हथियार का प्रयोग किया,
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जिससे शत्रु की सारी सेना सम्मोहित हो गई, अज चाहते तो उन सभी को वही पर मार सकते थे, लेकिन वहा एक चिठ्ठी लिखकर छोड दिया, उसमे लिखा था, की मै तुम सभी को प्राणदान देता हूं,
लेकिन इतना समझ लो, की मै तुम्हे कभी भी समाप्त कर सकता हूं, इसलिए तुम सब अपने आप को, मेरे अधीन जानो, और खुशी पूर्वक अपने यह राज्य किया करो, और दुबारा कभी मुझसे युद्ध करने का साहस मत करना,
अज की इस जीत से, इंदुमति उनके प्रति औंस आकर्षित हो गई, वे दोनों एक दूसरे से अगाध प्रेम करने लगे, जब राजकुमार अज अपनी पत्नी इंदुमति के साथ, अयोध्या के महल मे प्रवेश किया, ये देख महाराज रघु के अत्यधिक प्रसन्न हुए,
वही से उन्होंने पूरी धरती का सम्राट, अज को नियुक्त कर दिया, और स्वयं संन्यासी जीवन जीने लगे, कालीदास लिखते है, की जिस राज्य को पाने के लिए, आपस मे पुत्र कलह किया करते है, अपने पिता से ही लड़ जाते है,
उस राज्य को अज ने, सहज ही प्राप्त कर लिया, अब अज पूरे पृथ्वी के सम्राट बन चुके थे, और अपनी पत्नी के लिए, एक साधारण प्रेम वाले पाती भी थे, इधर महाराज रघु जब संन्यास जीवन व्यतीत कर रहे थे,
और अपनी आयु पूर्ण कर, अपने शरीर को छोड़कर स्वर्ग को प्रस्थान किया, अज ने अपने पिता की अंत्येष्टि विधि पूर्वक कराई, ऐसे ही समय बीत रहा था, कुछ समय बाद इंदुमति को एक पुत्र हुआ, वह पुत्र अपने लक्षणों मे, अपने दादा रघु,
और अपने पिता अज से भी बढा हुआ था, ज्योतिषों ने कहा, की यह पुत्र, आपके सूर्यवंश की कीर्ति को, दसों दिशाओं मे फैलाने वाला होगा, इस लिए उस पुत्र का नाम हुआ दशरथ, दशरथ धीरे धीरे बडे होने लगे,
इधर अज अपनी पत्नी से बहुत प्रेम किया करते थे, वह हर रोज अपनी पत्नी के साथ विहार किया करते थे, एक दिन जब वह उद्यान मे विहार कर रहे थे, उस समय इंदुमति, राजा अज के पैरो पर सिर रखकर सो रही थी,
उसी समय आकाश मार्ग से देवर्षि नारद जी निकल रहे थे, वह गोकर्ण तीर्थ की तरफ जा रहे थे, जब वह उद्यान के कुछ ही ऊपर से निकल रहे थे, तो हवा के झोके से, नारद जी के बीणा पर लगे पुष्प से, एक पुष्प निकलकर इंदुमति के ऊपर गिरा,
इंदुमति ने जितने ही क्षण मे उस पुष्प को देखा, उतने ही क्षण मे वह पुष्प अंतर्ध्यान हो गया, और उसी पल इंदुमति के प्राण निकल गए, कुछ समय तक राजा अज को, अंदेशा भी नही हुआ, की इंदुमति चली गई है,
लेकिन जब उन्होंने देखा, की इंदुमति का शरीर निश्चेष्ट है, और उनके मुख पर मृत्यु की कालिमा छा गई है, वह आश्चर्य रह गए, उन्होंने बहुत प्रयास किया, की इंदुमति जगे, लेकिन अब इंदुमति इस दुनिया मे नही रही,
राजा अज विलाप करने लगे, उनका विलाप इतना करूण था, की उनकी ये दसा देख, सभी सेवक सहित दासियां, और प्रजा रोने लगी, एक बार को तो अज के मन मे विचार आया, की वह इंदुमति के साथ सति हो जाए,
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यह एक क्रांतिकारी विचार था, स्त्रियों के सति होने की बात सुनी जाती थी, लेकिन पति के सति होने की बात नही सुनी जाती थी, अंततह अज ने ऐसा नही किया, क्योंकि वह एक पति ही नही, वह एक राजा और पिता भी थे, अब उनका राज काज मे मन बिल्कुल भी नही लग रहा था, इधर वसिष्ठ जी एक यज्ञ कर रहे थे, जिसके कारण वह राज्य मे नही थे,
जब उन्होंने अपनी त्रिकाल दृष्टि से ये सब देखा, तो उन्होंने अपने एक शिष्य को समझाने के लिए भेजा, जब शिष्य महल मे पहुंचा, तो उस समझ अज खोए हुए थे, तो शिष्य ने अज को बताया, की महाराज आपकी ये दसा को गुरू वसिष्ठ जी ने, अपनी त्रिकाल दृष्टि से देखा है, इसलिए उन्होंने मुझे भेजा है, और कहा है, की आपकी पत्नी जो स्वर्ग लोक चली गई है,
वह स्वर्ग जाने के लिए ही आई थी, वह पिछले जन्म मे, हरि नामक एक अप्सरा थी, उस अप्सरा को देवराज इन्द्र ने, त्रिणबिंदू रिषी के यहा, उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा था, जब हरि ने अपने प्रयासों से, त्रिणबिंदू रिषी की तपस्या भंग कर दी, तो त्रिणबिंदू ने उसे श्राप दे दिया था, की तुम अप्सरा योनी को छोड़कर, मानव योनी को प्राप्त हो जाओ,
इसके बाद हरि ने, रिषी से हाथ जोड़कर कहा, की प्रभु मे तो काम करने वाली हूं, मै तो आदेश का पालन कर रही थी, इसमे मेरी कोई गलती नही है, त्रिणबिंदू ने उसके विनम्र भाव को समझा, तो कहा, की जब तुम्हें स्वर्ग का कोई फूल दिखेगा, तो वापस अपनी अप्सरा योनी मे आ जाओगी, इसलिए जब देवर्षि नारद की बीणा से गिरा फूल, स्वर्ग का फूल था,
इसलिए उसे देखकर इंदुमति के प्राण निकल गए, अज ने इस बात को ध्यान से सुना, और अपने गुरु को प्रणाम किया, लेकिन इतना सब होने के बाद, अज का मन राज काज मे लगा ही नही, वह सदा के लिए इंदुमति के हो चुके थे, जैसे ही दशरथ कुछ युवा हुए, और राज्य के संचालन के योग्य हुए, तो अज ने तुरंत राज्य का भार, दशरथ को सौंप दिया, और स्वयं अनसन व्रत लेकर बैठ गए,
बिना कुछ खाए, बिना कुछ पिए, ईश्वर का ध्यान किया, और अंत मे अपने शरीर को त्यागकर, स्वर्ग मे अपनी पत्नी को प्राप्त किया, यहा रावण भी ब्रह्मा जी की तपस्या कर रहा था, जब कई वर्ष बीत गए, तो ब्रह्मा जी रावण की भक्ति से प्रसन्न हो गए, और सामने प्रकट होकर बोले, वर मांगो क्या चाहिए,
रावण की तो एक ही लालसा थी, तुरंत बोला, रघु महाराज ने जो बाण आपको दिया है, उसमे मेरे प्राण है, वो आप मुझे दे दो, ब्रह्मा जी ने सोचा, इसने तो फंसा दिया मुझे, अब ब्रह्मा जी ना चाहते हुए भी, उस बाण को रावण को देना पडा, रावण ने उस बाण को अपने प्रीय स्थान मे छिपा रखा है,
ये किसी को भी मालूम नही था, अब रावण अपने आप को, पूरी तरह सुरक्षित महसूस करने लगा था, और उसे मृत्यु का कोई भय नही था, इसलिए उसने अपना आतंक ओर फैलाने लगा, लेकिन कहते है, जब आतंक अपनी सीमा को पार कर लेता है, तो उसका विनाश करने स्वयं भगवान आते है, यहा रावण का मुकाबला करने का समर्थ किसी मे नही था,
अब अगली कहानी मे, सारी चीजो को विस्तार से कबर करेंगे, की आखिर राजा दशरथ पिछले जन्म मे कौन थे, और उन्ही के यहा प्रभु श्री राम ने क्यो जन्म लिया, माता कौशल्या ही मां क्यो बनी, और माता सीना राजा जनक की पुत्री क्यो बनी, और एक बार राजा जनक ने एक रिषी का क्यो अपमान किया था,
मतलब सम्पूर्ण रामायण को हम दिखाने का प्रयास करेंगे, और जो भी छेपक मे रामायण के प्रसंग है, उनको की कवर करेंगे, इस यात्रा मे मुझे आपकी सहायता चाहिए, क्या आप सम्पूर्ण रामायण की अमर गाथा का आनंद लेना चाहते है, मुझे ज्यादा से ज्यादा कमेंट करके बताओ, चलिए मिलते है अगली बेहतरीन कहानी के साथ, तब तक के लिए, जय श्री राम,
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