दो कन्याओ के शिलपिल्ले भगवान | Hindi Story

एक पारंपरिक भारतीय चित्रण जिसमें राजा की बेटी गांव पहुंचकर जमींदार की साधारण बेटी को गले लगा रही है; दोनों के बीच सच्ची मित्रता और भक्ति का भाव दिखाया गया है, पीछे गांव का घर और प्राकृतिक माहौल दिखाई देता है।

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क्या साधारण पत्थर मे भगवान हो सकते है, जो स्वयं घर से बाहर निकलकर आए, या नदी से बाहर निकलकर आए, हां यह सच है, भक्तमाल की एक अनसुनी कहानी, दो कन्याओ की अद्भुत भक्ति, जिससे ठाकुर जी स्वयं रीझ गए, 

कहानी की शुरुआत एक साधारण गांव से होती है, जहा एक जमींदार की छोटी लडकी थी, और उस गांव से कुछ दूरी पर एक राज्य था, जहा एक राजा की बेटी रहती थी, अक्सर जमींदार को राज्य मे किसी काम से जाना पडता था, 

तो कभी कभार वह, अपनी बेटी को भी ले जाता था, की वो भी इतने खूबसूरत महल को देखे, लडकी को भी महल की खूबसूरती और सुंदरता, अच्छी लगती थी, जब भी अपने पापा के साथ जाती, तो जमींदार तो अपने कार्य से जाता, 

लेकिन उसकी बेटी पूरे महल मे खेलती, ऐसे ही एक दिन, राजा की बेटी ने उसे देख लिया, जो एक गिरे हुए गमले को, सही सलामत उठाकर रख रही थी, और जहा वह गमला गिरा था, वहा कुछ कचडा भी हो गया था, 

तो उसे साफ कर रही थी, राजा की बेटी को उसका स्वभाव पसंद आया, वह उसके पास गई, और बोली तुम मेरी सखी बनोगी, वह साधारण लडकी पहले तो हिचकिचा गई, की राजा की बेटी, मुझे सखी बनने को कह रही है, 

वह कुछ कह पाती, इतने मे उसके पिताजी ने आवाज दी, बिटिया कहा हो, चलो आज जल्दी चलना है, उसने राजा की बेटी को बिना जवाब दिए, चली गई, अब जमींदार का राज्य मे कोई काम ना पडता था, ऐसे ही कुछ दिन बीत गए, 

इधर राजा की बेटी, हर रोज उसका इंतजार करती, की वो कब आएगी, क्योंकि उसे एक सरल स्वभाव वाली लडकी पसंद थी, और यहा वह जमींदार की भी लडकी सोचा करती, की मुझे कब महल मे जाने का मौका मिलेगा, 

मै उसकी सखी बनना चाहती हूं, उस दिन बेचारी को कुछ जवाब नही दिया, तो बुरा मान गई होगी, ऐसी वो खोए रहती थी, एक दिन राजा की बेटी से रहा ना गया, वह स्वयं गांव आ गई, और उस जमींदार के घर पहुंची, 

जमींदार ने जैसे देखा, वह हैरान रह गए, की राजा की बेटी यहा, बिना किसी सैनिक या सेविकाओं के साथ, तुरंत उसके पास गया, राजकुमार आप यहा, हां मुझे अपनी सखी से मिलना है, सखी वो भी तुम्हारी, 

राजकुमारी जी यहा आपकी कौन सखी है, इतने मे ही पीछे से जमींदार की बेटी निकली, तुरंत राजा की बेटी ने उसे गले लगा लिया, और बोली बाबा, ये है मेरी सखी, जमींदार एक पल के लिए स्तब्ध रह गया, 

की कहा महलो की राजकुमारी, और कहा एक गांव की लडकी, इसके बाद दोनों बाते करने लगी, की उस दिन मैने तुमसे कहा था, तुमने बिना कुछ जवाब दिए चली आई थी, सखी मुझे माफ कर दो, जब तुमने सखी का प्रस्ताव मेरे सामने रखा, 

मुझे यकीन नही हो रहा था, और मै कुछ कह पाती, तभी पिताजी ने आवाज दी, तो मै चली आई थी, दोनो ने एक दूसरे को माफ किया, और एक गहरी मित्रता की शुरुआत हुई, अब तो वह जमींदार की बेटी, बिना किसी से पूछे महल मे, कही भी आ जा सकती थी, 

"गाँव की दो छोटी कन्याएँ folded hands के साथ संत महात्मा से प्रार्थना करती हुई, जबकि संत अपने शालिग्राम भगवान को लकड़ी के बक्से में लेकर जाने की तैयारी कर रहे हैं; पीछे ग्रामीण खड़े दृश्य देख रहे हैं। भारतीय ग्रामीण संस्कृति और भक्ति का भावुक दृश्य।"

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कोई उसे नही रोकता था, सभी जानने लगे, की वह राजकुमारी की सखी है, दोनो हर रोज बगीचे मे खेलते, ऐसे ही एक बार एक संत महात्मा, चातुर्मास करने के लिए उस गांव मे पधारे, और गांव मे उस जमींदार के यहा चार महिने रूके, 

जब भी को महात्मा या रसिक आते है, तो उनकी एक अलग और पवित्र व्यवस्था कराई जाती है, ताकी उन्हें अपनी पूजा पाठ मे कोई दिक्कत ना हो, उसी प्रकार उस जमींदार ने महात्मा के लिए, एक अच्छी व्यवस्था की, 

अगले दिन हर रोज की तरह राज की बेटी आई, दोनो वही पास ही खेल रहे थे, उसी समय उन संत ने, अपनी पूजा पाठ करना प्रारंभ किया, बढ़िया एक स्थान को पवित्र किया, और उसमे एक साफ कपडा बिछाया, और सिंघासन रखा, 

फिर अपने शालिग्राम को निकाला, उन्हें अच्छे से स्नान कराया, इत्र आदि लगा, इधर संत अपनी पूजा मे मस्त थे, और बाहर से ये दोनों कन्याएं देख रही थी, फिर दोनो ने एक दूसरे को देखकर बोला, ये वाला खेल हम भी खेलेंगे, 

ये खेल तो बहुत अच्छा है, तुलती तोड़कर लाओ, चढा दो, पुष्प तोड़कर लाओ, चढा दो, इत्र से भगवान को चिकने कर दो, माला पहनाओ, आरती करो, और भोग लगाओ, जैसे हम खाते है, वैसे इन्हें खिलाओ, ये खेल बहुत अच्छा है, 

हम दोनो खेलेंगे, तभी एक बोली पहले सीख तो ले, फिर खेला करेंगे, अब उन दोनों का यही नियम हो गया, जब संत अपनी पूजा मे बैठते, तो दोनों जाकर उन्हें देख देखकर सीखा करती, फिर दोनो बाते करती, आज ऐसी किया है, 

फिर ऐसा करना है, उन दोनों के चार महिने, देखने मे ही निकल गए, अब चार महिने बाद, उन महापुरूष के जाने का समय हुआ, संत ने अपना सारा कुछ समेटना शुरू किया, सुबह सुबह दोनो लाली आई, देखा की पर्दा निकाला जा रहा है, 

सिंघासन बंद किया जा रहा है, ठाकुर जी उठाकर बक्सा मे रखे जा रहे है, दोनो रोने लगी, बोले ये क्या हो रहा है, संत महात्मा जी बोले, लाली अब सेवा पूर्ण हुई, अब हम जा रहे है, दोनो कन्याएं फूट फूटकर रोने लगी, 

महाराज जी के सामने हाथ जोड़कर बोली, बाबा आप चले जाओ, पर अपने ठाकुर जी हमको दे जाओ, हमने पूरी सेवा सीख ली है, हम चार महिने यही तो करते थे, की आप कैसे सेवा करते हो, महाराज जी ने सोचा, छोटी छोटी लाली है, 

ये कैसे करेंगे ठाकुर जी की सेवा, बाबा जी आपको यकीन ना हो, आप हमसे पूछ लो, सेवा की सारी प्रक्रिया, सुबह इतने बजे उठना है, फिर ठाकुर जी को दूध का भोग लगाना है, फिर गर्म जल से स्नान कराना है, फिर पवित्र वस्त्र से साफ करना है, 

फिर तुलसी अर्पित करना है, फिर भोग लगाना है, सब आता है हमको, आप अपने ठाकुर जी हमको दे जाओ, संत परेशान होने लगे, की अब क्या किया जाए, धीरे धीरे गांव के कुछ लोग आ गए, जब संत ने सारी बात बताई, तो गांव के लोग,

 उस जमींदार की बेटी को समझाने लगे, लेकिन कोई भी उस राजा की बेटी को नही समझा रहा था, संत बोले आप लोग एक को समझा रहे हो, इस लाली को भी समझाओ, इतने मे जमींदार वहा आ गया

"एक पारंपरिक भारतीय पेंटिंग, जिसमें जमींदार की बेटी और राजकुमारी अपने-अपने शिलपिल्ले भगवान को हाथों में लिए खड़ी हैं। दोनों कन्याओं के चेहरे पर मासूम भक्ति दिखाई देती है, और पीछे गांव के लोग खड़े हैं। चित्र 16:9 में इस अनसुनी भक्तमाल कथा का सार दिखाता है, जिसमें दो बालिकाएँ पत्थर को भगवान मानकर सेवा करती हैं।"

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और बोला, की महाराज ये मेरी बेटी है, इसे ना दो तो चलेगा, लेकिन दूसरी राजा की बेटी है, अगर इसे नही दिया आपने, और अगर इसने जाकर अपने पिता से, शिकायत कर दी, तो आप भी जानते है राजा की कहां तक पहुंच है, 

अगला चातुर्मास देख नही पाओगे आप, ओर ये सभी इसे इसलिए नही समझा रहे है, यदि राजा को पता चला, और राजा अगर इन्हें समझाया, तो इन्हें ढूंढे धरती नहीं मिलेगी, महाराज जी सोचे हम तो गलत फस गए, 

जमींदार बोला, और सुनिए महात्मा जी, अगर आपने राजा की कन्या को दे दिया, और मेरी कन्या को नही दिया, तो इन दोनों मे क्लेश होगा, और इसके कारण हो सकता है की, राजा नाराज हो जाए, और मुझे और मेरी बेटी को इस नगर से बाहर कर दे, 

महाराज जी सब बिगड़ जाएगा, इसलिए इन दोनों को ठाकुर जी दे जाओ, तभी संत जी बोले, ये कोई खिलौना है दे जाओ, पचास साल से सेवा कर रहा हूं इनकी, ऐसे कैसे दे जाऊंगा, तो फिर आप ही सोच लो क्या करना है, 

संत ने बैठकर कुछ देर बिचार किया, और फिर वह बाहर गए, और शालिग्राम जैसे दिखने वाले, दो पत्थर ले आए, और जल्दी से उन्हें तेल आदि लगाकर चिकना किया, और तिलक लगाकर सिंघासन पर बैठा दिया, 

और अपने शालिग्राम को एक सामान्य सी चौकी मे रख दिया, इसके बाद दोनों कन्याओ को बुलाया, और कहा, बेटा बताओ ठाकुर जी कहा है, एक बोली वो ऊपर बैठे है, और ये कौन है, ये भी ठाकुर जी है, तभी महाराज जी बोले नही, 

ऊपर वाले जो है वो ठाकुर जी है, और नीचे सेवक है, अब बताओ, तुमको सेवक चाहिए या ठाकुर जी, दोनो बोली, नही नही हमे तो ठाकुर जी चाहिए, सेवक नही चाहिए, तो सेवक मै ले जाऊं, हां आप ले जाओ, तब जाकर संत को जी मे जी आया, 

हालांकि गांव के सभी जानते थे, की महात्मा जी ने अपनी चतुराई दिखाई है, जमींदार बोला, वाह महात्मा जी अपने अच्छी बुद्धि युक्ति लगाई है, समान्य से पत्थर दोनो कन्याओ को दे दिया, जैसे ही महात्मा जी जाने लगे, 

तभी कन्याएं बोली, इनका नाम क्या है, तांगा मे बैठे बैठे बोल दिया शिलपिल्ले भगवान, अब आप सोच कर देखो, ना को सम्प्रदाय है, ना कोई पद्धति है, ना किसी प्रकार का क्रम है, और ना ही भगवान अश्ली है, केवल सामान्य गली का पत्थर है, 

अब यहा दोनों कन्याओ को भगवान मिल गए, उनके चेहरे पर बडी प्रसन्नता थी, जैसे उन्हें उनके प्राण मिल गए हो, अब जो जमींदार की बेटी थी, वो अपना घर मे उनकी सेवा करती, और जो राजा की बेटी थी, वो अपने राजभवन मे सेव करती, और जब भी दोनो मिलते, 

तो अपने अपने शिलपिल्ले भगवान की बाते किया करते, आज तुमने क्या खिलाया, आज मैने खीर का भोग लगाया है, और मैने गुड का भोग लगाया है, और भी खूब सारी बाते करती, और दोनो बडी प्रसन्न रहती थी, 

इधर जमींदार का जो छोटा भाई था, वो अपने बडे भाई, यानी जमींदार से वैर मान करता था, जब उसकी नियत काफी बिगड़ गई, तो उसने सही मौके का इंतजार करने लगा, उसका इयादा था, की भाई का सारा धन चोरी करूंगा, 

एक गांव की भावुक कन्या अपने चोरी हुए शिलपिल्ले भगवान को पुकारती हुई, चाचा के घर के सामने खड़ी है। उसकी भक्ति सुनकर पत्थर रूपी भगवान दिव्य प्रकाश के साथ स्वयं बाहर आ रहे हैं, और पास में खड़ा चाचा भय और आश्चर्य से देख रहा है।"


इसके लिए उसने कुछ चोरो को भी बुलाया, जिससे काम जल्दी और सफाई से हो जाए, ठीक कुछ दिन बाद जमींदार को, किसी काम से दूसरे गांव जान था, उसी दिन छोटे भाई ने, अपने चोरो तक संदेश पहुंचा दिया, की आज हर हाल मे समान चोरी करना है, 

अब चोर बडी सफाई से घर के अंदर गुसे, और जब वह समान चोरी कर रहे थे, तो चोरी के साथ साथ उन्होंने, बेटी के शिलपिल्ले भगवान भी चोरी कर लिया, जैसे ही सुबह जमींदार घर मे प्रवेश हुआ, तो यहा सभी रो रहे थे, 

उसने जा कर देखा, तो उसकी पत्नी ने सारा वृत्तांत बताया, की कल रात घर से समान चोरी हो गया है, सभी अपने अपने कीमती समान को लेकर दुखी हो रहे थे, लेकिन उसकी बेटी अपने शिलपिल्ले भगवान को लेकर बडी दुखी थी, 

उन्होंने कुछ खाया नही होगा सुबह से, भूखे बैठे होंगें बेचारे, सुबह से उठते ही दूध पीते है, आज पता नही कहा चले गए, पिताजी मेरे शिलपिल्ले भगवान लाओ, कह कह कर रो रही थी, जमींदार को पहले से ही पता था, की वो एक समान्य पत्थर है, 

लेकिन बेटी दुखी ना इसलिए उसे कुछ कह नही रहा था, लेकिन यहा आज समान चोरी हो गया, और उसे पत्थर की पडी है, उसलिए हल्का क्रोध मे अपनी बेटी से बोला, यहा कीमती समान चोरी हो गया है, तुझे वो पत्थर की पडी है, 

पिताजी पत्थर नही है वो, वो शिलपिल्ले भगवान है, मै उन्हें खाना खिलाती हूं, वो मुझसे बात करते है, किसी ने उसकी बात नही सुनी, अब यहा दो तीन दिन बीत गए, परिवार का जो धन के प्रति कष्ट था, वो थोडा थोडा कम हो गया था, 

लेकिन उस कन्या का हाल बेहाल था, ना कुछ खाए ना पिए, सभी उसे मनाते, लेकिन बोली, की मै प्राण त्याग दूंगी, अगर मेरे भगवान नही आए तो, तभी उसके पिताजी ने बोला, बेटी देख, ये सारा किया धरा तेरे चाचा का है, हम सब जानते है,

 उसने सारा धन अपने घर मे धर रखा है, लेकिन क्या बताए, समाज मे उसकी क्षवी बढ़िया है, लोग मानेंगे नही, सभी चोरो का इलजाम लगा रहे है, लेकिन तू तो उसकी भतीजी है, तू जा घर चली जा, और वोल दे, की कुछ दो या ना दो, लेकिन मेरे भगवान दे दो, 

बेटी बिना समय गंवाए चाचा के घर गई, चाचा तो उसके द्वार पर खाट मे ही बैठे थे, बोली चाचा जी मुझे पता है, की चोरी आपने कराई है, ये सुनते ही चाचा क्रोध मे आग बबूला हो गया, तुझे किसने कहा मैने चोरी की है, बेटी बोली मै आपको दोस देने नही आई हूं, 

मेरे शिलपिल्ले भगवान है उसमे, आप उन्हें दे दो, बाकी कुछ दो या मत दो, चाचा ने विचार किया, अगर मैने इसे शिलपिल्ले दे दिया, तो प्रमाणित हो जाएगा, की चोरी मैने कराई है, तभी उन्होंने मजाक मे बोला, 

की तेरे भक्ति बहुत है, और तू अपने घर से चलकर आई है, तो बुला ले अपने शिलपिल्ले भगवान को, अगर घर मे होंगे तो चलकर आ जाएंगे, इतना तो कर ही सकते है, अब उस कन्या की भक्ति की पराकाष्ठा थी, उसने अपनी भुजाओ को फैलाया, 

और नेत्र सजल भाव से, शरीर कांप रहा है, और भाव के साथ बोली, हे मेरे शिलपिल्ले भगवान, अगर मै भाव के साथ आपकी सेवा की हो, अगर सेवा मे कोई चूक ना रही हो, तो आप चलकर बाहर आ जाओ, 

एक पारंपरिक भारतीय शैली की चित्रकला जिसमें राजकुमारी अपनी पालकी में बैठी है, उसके हाथों में शिलपिल्ले भगवान विराजमान हैं, और राजकुमार उसके सामने बैठा आश्चर्य से देख रहा है। राजकुमारी क्रोध और श्रद्धा के मिश्रित भाव से भगवान को प्राणनाथ कहती हुई दिखाई देती है। पृष्ठभूमि में यात्रा करता हुआ शाही दल भी नजर आता है।


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उस छोटी कन्या के इतना कहते ही, एक अद्भुत चमत्कार हुआ, वह समान्य सा पत्थर खुद चलकर आया, और उस कन्या के ह्रदय से लग गया, उधर खडे कुछ लोग, और उसका चाचा, ये देख भौंचक्का रह गए, 

उसके चाचा को अपनी आंखों मे यकीन नही हो रहा था, एक पत्थर निकलकर आया, और कन्या के गले लग गया, तुरंत अपनी भतीजी के चरणो मे झुक गया, और बोला, जिस घर मे ऐसी भक्त कन्या है, उस घर से मै विद्रोह मान रहा हूं, 

उसने अपनी भतीजी से क्षमा मांगी, और तुरंत सारा धन लेकर गया, और अपने भईया को दिया, और भईया को सारी बात बताई, ये बस सुनते ही जमींदार और उसकी पत्नी, दोनो हैरान रह गए, अभी तक जिसे एक समान्य पत्थर समझ रहे थे, 

तब उनको विश्वास हुआ, की ये तो साक्षात्कार परमात्मा है, इसके बाद सभी सुख पूर्वक रहने लगे, अब यहा कुछ समय बाद, राज कन्या भी विवाह के योग्य हुई, तो राजा ने एक राजकुमार को नियुक्त किया, अगले दिन राजकुमार सहित सभी महल मे पधारे, 

तभी राजकुमारी ने सभी के सामने यह प्रस्ताव रखा, की मै विवाह के साथ, अपने शिलपिल्ले भगवान को ले चलूंगी, ये बात सुनते ही, जिस राजकुमार से विवाह हो रहा था, वो बहुत जोर हंसा, उसका ऐसा हंसना राजकुमारी को खडट गया, 

की मै इससे ब्याह तो करूंगी, लेकिन इसके साथ रहूंगी नही, मेरे ठाकुर जी की हंसी उठा रहा है, इसके बाद सभी ने कहा, ठीक है आप ले चलना अपने शिलपिल्ले भगवान को, समय अनुसार शुभ मुहूर्त आया, और दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ,

 जब राजकुमारी रानी बनकर पालकी मे बैठकर जा रही थी, तो ऐसे ही एक जगह रूके, की थोडा भोजन पानी कर लिया जाए, यहा सभी भोजन कर रहे थे, उधर पालकी मे बैठी राजकुमारी, भगवान से बात कर रही थी, की भूख लगी है कुछ खाओगे, 

अरे आज तो बहुत थक गए होंगे आप, अभी कुछ समय मे हम लोग पहुंच जाएंगे, तो मे वहा पवित्र प्रसाद बनाकर आपको खिलाऊंगी, ऐसे रास्ते मे नही खाता, क्या पता किसका जूठा कूठा हो, राजकुमारी ऐसी ही अपने शिलपिल्ले भगवान से बाते कर रही थी, 

इधर राजकुमार ने सोचा, सभी लोग व्यस्त है, मै जाकर पालकी मे बैठूं, थोडा बात तो करू अपनी पत्नी से, तो राजकुमार पालकी मे गया, और अंदर बैठ गया, बोला क्या बड़बड़ा रही थी तुम, किससे बात कर रही थी, 

तभी हल्की स्माइल के साथ, उसने डलिया मे रखे शिलपिल्ले भगवान के दिखाया, बोली मेरे प्राण नाथ, मेरे जीवन नाथ, मेरे सर्वस्व, शिलपिल्ले भगवान से बात कर रही थी, तभी राजकुमार बोला तू सुन, ये कुछ भी बोला कर, 

पर ये प्राणनाथ ना बोला कर, तेरा प्राणनाथ मै हूं, सात फेरे होने के बाद, जीवन भर तेरा प्राणनाथ मै रहूंगा, ये पत्थर को प्राणनाथ ना बोला कर, ये सुनते ही, राजकुमारी तो पहले से ही चिड़ी बैठी थी, क्रोध मे आकर बोली, तुम कैसे प्राणनाथ हो सकते हो, 

तुमको अपने प्राणो के बारे पता है, तुम्हें पता है, की तुम्हारे प्राण कब चले जाएं, तुम मेरे प्राणनाथ कैसे हो सकते हो, अरे ये संसार समाज है, विवाह करना पड़ता है कन्या को, 

एक पारंपरिक भारतीय चित्रकला जिसमें राजकुमारी सरोवर के किनारे अपने शिलपिल्ले भगवान को हृदय से लगाकर रो रही है, और पास ही राजकुमार घुटनों पर बैठकर क्षमा मांग रहा है। सरोवर से भगवान का चमत्कारिक रूप प्रकट होता दिखाई दे रहा है। 16:9 चित्र, भारतीय लोक–शैली, भक्ति और चमत्कार को दर्शाता हुआ।   ---

प्रेमानंद जी का किशोरी जी से मिलना पढ़ें click 

तुमसे ब्याह कर लिया है मैने, यही सौभाग्य समझो, और हा, वास्तव मे तो मेरे शिलपिल्ले भगवान, तुमपर कृपा करने को जा रहे है, मेरे तो प्राणनाथ मेरे शिलपिल्ले भगवान है, ये सब सुनने के बाद, राजकुमार को बहुत क्रोध आया, 

और उसने वह शिलपिल्ले भगवान को लिया, और सरोवर मे फेंक दिया, बोले ले तेरे सिलपिल्ले भगवान पानी मे डूब गए, अब बुला ले उनको, ये देखकर राजकुमारी रोने लगी, और दौड़कर सरोवर की तरफ भागी, की मै अपने प्राण त्याग दूंगी,

 तुरंत राजा रानी ने अपनी बहूं को पकड़ा, लेकिन राजकुमारी रो रोकर कहे, की मेरे प्राण चले गए, अब मै जीवित नही रह सकती, तभी राजकुमार पीछे से बोल पडा, उनमे तो तेरे प्राण थे, वो तेरे प्राणो की रक्षा करते है ना, तूने इतना किया उनके लिए, 

तूने इतनी सेवा की उनकी, आज वो तुझसे दूर चले गए, उनका इतना तो फर्ज बनता है, की वो स्वयं चलकर तेरे पास आ जाए, अगर असली मे उस पत्थर पर भगवान होंगे, तो आ जाएंगे, यहा पर अब राजकुमारी की भक्ति की परिक्षा थी, 

उसे अपनी भक्ति को सिद्ध करना था, अब उसने भक्ति भरी पुकार के साथ बोली, हे मेरे शिलपिल्ले भगवान, अगर मैने आपकी बडे भाव के साथ सेवा की हो, और सेवा मे कोई चूक ना रही हो, तो कृपा करके आप मेरे पास आ जाओ, 

यहा वही चमत्कार हुआ, सरोवर से वह शिलपिल्ले भगवान अपने आप बाहर आए, और उस राजकुमारी के हृदय से लग गए, ये अद्भुत दृश्य को जैसे सभी ने देखा, एक पल के लिए सभी स्तब्ध रह गए, राजकुमार दौड़कर अपनी पत्नी के पास गया, 

और घुटने टेककर बोला, हे देवी मुझसे बहुत बडा अपराध हो गया है, मैने तेरे भगवान को केवल एक पत्थर की दृष्टि से देखा, कृपा करो देवी मुझपर, कृपा करो, राजकुमार रोए जा रहा था, राजकुमारी ने जैसे देखा, की मेरे पती को अपनी गलती का अहसास हो गया है, 

तो उसने उसे क्षमा कर दिया, और दोनों एक दूसरे के गले लगे, यह कहानी से हमे बहुत बडी सीख मिलती है, गंगा ना मानने वालो के लिए, वह बहता पानी है, लेकिन मानने वालो के लिए, वह मुक्ति द्वार है,

 वाकई मे अगर भक्ति को अगर प्रधान रखा जाए, तो यही जीवन का सम्पूर्ण रस है, अगर भक्ति भरी कहानी आपको अच्छी लगी हो, तो हमारे साथ अवश्य जुड़े,

 क्योंकि हम ऐसी ही धार्मिक पौराणिक कहानियां लाते रहते है, मिलते है अगली बेहतरीन कहानी के साथ, तब तक के लिए जय श्री राधे कृष्णा, 


ऐसी और धार्मिक कहानियां को पढ़ना पसंद करते हैं तो हमारे साथ अवश्य जुड़े, धन्यवाद 


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