राधा रानी और यशोदा मईया की एक कहानी...
यह कथा बहुत ही मजेदार है, जब किशोरी जी छोटी थी, उस समय एक बार यशोदा मईया ने, राधा जी की गोद भरी थी, कहानी को पूरा देखे बगैर रह नही पाओगे, क्योंकि इसमे भाव के साथ मजा बहुत है,
तो चलिए अब शुरू करते है, बरसाने मे अभी रात्रि का समय है, किशोरी जी की अभी छोटी अवस्था है, वह अपने बिस्तर पर लेटी है, और मनन चिन्तन कर रही है, की श्यामसुंदर की मुस्कनिया कैसी होगी,
उनके नेत्र कैसे होंगे, वो कैसे चलते होंगे, और अभी वह क्या कर रहे होंगे, ऐसे ही चिंतन मे डूबी थी, और वही हाल यहा श्यामसुंदर का है, रात भर करवट बदल रहे है, कहा है, कौन की छोरी आई,
ऐसो पागल बनाकर चली गई है, वह हर रोज यमुना के घाट पर खोजे, लेकिन वो नही मिल रही थी, जब किसी तरह रात्रि बीती, और अगले दिन का समय हुआ, तो इधर किशोरी जी ने मन बना लिया,
कि आज नंदगांव चलना है, उसने अपनी कुछ सखियों को इकठ्ठा किया, और उनसे कहा, की आज नंदगांव चलना है, तभी एक बोली अरे नंदगांव बहुत दूर है, और तू ना जाने वहा कौन रहे, छलिया माखन चोर,
हमने सुनी है वह टेढ़ी टेढ़ी सी चाल चले, और वह तुरंत सभी को अपना दिवाना बना लेता है, और अपने चंगुल मे फंसा लेता है, बहुत मीठी मीठी बात करता है, किशोरी तू जो कहेगी वो करेंगे, लेकिन नंदगांव ना जाएंगे,
अच्छा ठीक है नंदगांव ना चलो, लेकिन कुछ दूर तक तो चलो, मेरी बहुत इच्छा है, आप लोग मेरा कहा नही मानोगी, जब किशोरी जी भावुक होकर बोली, तो सभी सखी तैयार हो गई, अच्छा ठीक है कुछ ही दूर चलेंगे,
और तुरंत लौट आएंगे, हां हा ठीक है, फिर सभी नंदगांव की ओर चलने लगी, किशोरी जी के तो मन मे यही था, की आज कुछ भी हो जाए, मुझे नंदगांव जाना है, जब बहुत दूर आ चुकी थी,
और किशोरी जी लौटने का नाम ही नही ले रही थी, तो उनकी एक एक करके सभी सखियो ने, किशोरी जी को छोड़ दिया, और बची किशोरी जी अकेली, उसे थोड़ा डर तो लग रहा था, लेकिन हिम्मत नही हारी,
और वह पहुंच गई नंदगांव, नंदगांव की टेढ़ी मेढी गलियां दिखे, उसे कुछ समझ ना आए, वह सभी से पूछे, कुंवर कान्हा कहा रहे, कुंवर कान्हा को घर कहा है, इतने मे ही एक बूढ़ी अम्मा सामने से आती दिखी,
जैसे ही अम्मा ने किशोरी जी को देखा, छोटी प्यारी सी लाली, कितनी सुन्दर है, अरे लाली क्या हुआ, कौन को खोज रही है, मै कुंवर कन्हैया को खोज रही हो, वो कहा है, तुमको नही पता कहा है, नही पता है,
आप बताओ ना मईया, चल मेरे संग मै लेकर चलती हूं, अब दोनो नंदगांव मे भ्रमण करते हुए चल रही है, देखो लाली इससे आगे हम नही जा सकते, राजा को घर है, वो सामने को भवन है,
उसी मे कुंवर कन्हैया रहता है, तुम चली जाओ, अब किशोरी जी भवन की ओर बढ़ने लगी, यहा भीतर ठाकुर जी बैठे यशोदा मईया के पास, यशोदा मईया नाराज होकर बोल रही है, लाला तेरी बहुत शिकायते आ रही है,
अब तो सब जगह से आ रही है, तू इतनी चोरी करता है, तुम अब चोरी छोड़ दो, तभी ठाकुर जी बोले, मै चोरी छोड़ दूंगा, लेकिन बदले मे मुझे क्या दोगी, जो तू कहेगा सो तुझे दूंगी, मै कशम खाता हूं, किसी के घर चोरी करने नही जाऊंगा मईया,
पर सांची कहत बुलावे मोको, तू दुल्हन गोरी, अच्छा दुल्हन चाहिए तोको, हा मईया दुल्हन चाहिए मुझे, काहे के लिए चाहिए, मईया जो सुबह से मुझे उठाए, और अच्छा अच्छा खाना खिलाए, जो सेवा तू करे मेरी, वैसी दुल्हन चाहिए मुझे,
और सुनो मईया, जैसी मुझे चाहिए वैसे लाना, पहले मेरी पूरी बात सुन लो, बता कैसी चाहिए तुझे, गोरी हो और छोटी सी हो,
ज्यादा तेज तर्रार मत लाना, मुझे तुमसे अलग कर देगी, तेरो घर बनवा देगी यमुना के पुलिन पे, फिर तू और बाबा वही रहना, मै और बहु यहा रहा करेंगे, और मईया पैनी सी नाक हो उसकी, तोता जैसी,
और जब तू उसके सामने आए, तो वह घुंघट कर ले, और थोड़ी थोडी मुस्काए, ऐसी बहु लेआ मुझे, यशोदा मईया बैठी बैठी सब सुन रही थी, और फिर बोली,
ज्यो ज्यो बडा होता जा रहो है, त्यो त्यो तेरे भीतर जन क्या प्रकट हो रहो है, कहा से लाए इन सब बातन मे, बडी आंख वाली, पैनी नाक वाली चाहिए, भोरी सी चाहिए ऐसी चाहिए, कौन सिखावे तोको,
मईया देख बात मत बदल, चोरी छोडू की नही, लाला मेरी बात मान चोरी छोड दे, तो मेरी बात मान लो, और मईया सुनो, जब मै ब्याह करने को जाऊंगा, तो बलदाऊ को अपने साथ नही ले जाऊंगा, क्यो नही लेकर चलेगा, मईया वो गोरा है, और मै कारो, शायद अंत मे बहु का मन बदल गया,
और उसने माला दाऊ दादा को पहना दिया तो, इसलिए मै बलदाऊ को लेकर नही जाऊंगा, और मईया अभी बाब से कहो, मेरे लिए घोडी लेकर आए, अभी ब्याह करवे जाऊंगा, तभी मईया बोली, ये सब चले तेरे मन मे,
यही सब करे तू बाहर वन मे जाकर, श्रीदामा और मधुमंगल के साथ, आए दिन यही सब सीख के आए तू, मईया मोरो ब्या करा दे, इधर इतने मे ही बाहर से, किशोरी जी चिल्लाने लगी, अरे कुंवर कन्हैया, ओव कुंवर कन्हैया,
जैसे ही ठाकुर जी ने आवाज सुनी, तुरंत मईया से बोले, मईया मुझे लगता है बहु आ गई, ये तो स्वर कही सुना है मैने, ठाकुर जी दौड़कर बाहर गए, तो देखा सामने किशोरी जी खडी है, जैसा वर्णन भीतर कर रहे थे, वही सामने आ गई, वाह रे विधाता, तेने कैसे सुन ली मेरी,
जैसे मुझे चाहिए वैसे ही भेज दिया, इतने मे पीछे से यशोदा मईया बाहर आई, मईया ने जैसे ही नंद भवन के द्वार पर, नन्ही सी किशोरी जी को देखा, किशोरी जी को देखकर यशोदा मईया के यन मे भाव आया, हे विधाता मै सोच रही थी, की एक दिन अपने लाला के लिए बहु लाऊंगी,
ये जो सामने खडी है, इसका रूप कैसो है, देखो कितना प्यारा चेहरा है, कितनी सुन्दर मुस्कनिया है, इसकी चाल कितनी सुन्दर, कितना अद्भुत रूप है, यशोदा मईया उसे देख मोहित हो गई, यशोदा मईया ने परिचय भी नही पूछा, बोली लाली तनिक इधर आओ, किशोरी जी मईया के पास गई,
क्या मै ह्रदय से लगा लूं, हां मईया लगा लो, जैसे ही मईया ने किशोरी जी को हृदय से लगाया, मईया के नेत्र सजल हो गए, ऐसी सीतलता को अनुभव हुआ, जो अनुभव सदैव कन्हैया की ह्रदय से लगाने मे होता है,
पहली बार किसी बालक को गले लगाने मे ऐसा अनुभव हुआ, कौन है लाली, कहां से आई है, तेरो गांव कहा है, मईया मुझे सब जानते है, कौन हो मुझे तो नही पता, मै वृषभानु की लाली हूं, कीर्ति मईया आपको अच्छे से जानती है,
अच्छा तुम वृषभानु की लाली है, हां मईया, यशोदा मईया से रहा ना गया, उनके मन मे बार बार भाव आए, तो उन्होंने किशोरी जी को एक जगह बैठाया, और बोली, की तेरो श्रृंगार कर दूं, नही आप श्रृंगार ना करो, मईया नाराज हो जाएंगी, कछू ना होंगी,
कह देना यशोदा मईया ने किया है, अच्छा, तो कर दो, अब यशोदा मईया अंदर से श्रृंगार लेकर आई, और किशोरी जी का श्रृंगार करना शुरू किया, इतना सुन्दर श्रृंगार किया, और किशोरी जी की गोद भर दी, मांग मे सिंदूर भर दिया,
खूब सारो समान देकर, लाल चुनरी उड़ाकर बोली, लाली अब जाओ, कोई कछू पूछें तो कह देना, यशोदा मईया ने किया है, कोई कुछ नही कहेगा, अब किशोरी जी कन्हैया को इशारा किया, अब तुम आईयो हमारे यहा, हां मे आऊंगा,
अब तुम मत आना, ऐसे ही मै आऊंगा, अब वहा से किशोरी जी बरसाने की ओर चलने लगी, इधर कीर्ति मईया पूरे बरसाने मे खोजो, पता नही मेरी लाली कहा चरी गई, छोटी सी है, कोई बहका के ले गया है,
मईया सब जगह खोजे लेकिन किशोरी जी नही मिली, इतने मे ही नंदभवन के मार्ग से, किशोरी जी चली आ रही है, वैसे ही किशोरी जी इतनी सुन्दर है, और ऊपर से यशोदा मईया ने इतना सुन्दर सिंगार कर दिया,
मईया ने पत्रावली का श्रृंगार किया है, जैसे ही कीर्ति मईया ने पहचान, तुरंत दौड़कर गई, और ह्रदय से लगा लिया, लाली तू कहा चली गई थी, मै कब से खोज रही हूं, और ये क्या भयो, तेरी मांग कौन ने भर दी,
ये तेरे होठों मे लालीमा किसने रच दी, और ये गले मे हार, ये सब कौन ने किया, मईया मै गई थी नंदगांव, वहा यशोदा मईया ने मेरा श्रृंगार कर दिया है, कीर्ति मईया ने श्रृंगार देखकर समझ गई, की यशोदा मईया ने मेरी लाली की,
गोद भर दिया है, कीर्ति मईया को अब चिंता होने लगी, की ये कैसा संदेश है, उस समय बरसाने की एक एक सखी पूर्णमासी, उनको संदेश देकर बुलाया, सबसे बूढ़ी वही है, सभी के ब्याह कराते डोले नंदगांव बरसाने में,
जब पूर्णमासी आई, तो कीर्ति मईया बोली, देखो मेरी लाली को, कैसो श्रृंगार कर दिया, क्या क्या समान दे दिया, इन सबको क्या समझूं मै, मासी बोली अरे, याको मतलब सीधो सीधो है, वो अपने लाला को तेरी लाली से ब्याह करना चाहे,
गोद भर दिया है तेरी लाली की, उस छोरा से करूंगी मै अपनी लाली का ब्याह, कारो कलूटा माखन चोर, अपनी छोरी का ब्याह कारो कलूटा से थोड़ी नही करूंगी, मेरी इतनी सुन्दर लाली, वो माखन चोरी करने वाला,
सब जगह गोपियों के पीछे पीछे डोले, और टेडी टेली चाल चले, उसके बारे मे काफी सुनो मैने, कारो सो, उससे तो मै ना करूंगी, मेरी लाली देखो, कैसी दूध जैसी रखी है, उस कारे के संग तो ना करूंगी,
ये सब सुनने के बाद, पूरनमासी बोली, की देख सखी, रूप रंग सबके अलग अलग रहते है, ऐसा तो है नही, की जैसी तेरी लाली है, उसे वैसा ही वर मिलेगा, अरे चंद्रमा की शोभा तभी दिखे, जब काली निशा छा जाती है,
तू सोच तो सखी, अगर तेरी लाली का ब्याह उससे हो गया, और वो तेरी लाली के बगल मे खडा भी हो गया, तो सभी देखेंगे तो तेरी लाली को ही, तुमको क्यो चिंता है उससे, और रही बात चोरी की,
तो कौन ना करे चोरी इस दुनिया मे, जगत मे जो देखे सब चोर, ये सब बात सुनने के बाद, कीर्ति मईया भी विचार करने लगी, ठीक है सखी जब मेरी लाली बडी हो जाएगी, और उसे भी सब कुछ समझ आने लगेगा,
तो उसको भी अपनी जीवन साथी चुनने का मौका देना चाहिए, यही एक कहानी थी, जब यशोदा मईया ने किशोरी जी की गोद भरी थी, ये छोटी अद्भुत लीला भरी कहानी, आपको कैसी लगी,
हमे एक प्यारे से कमेंट मे जरूर बताना, फिर मिलते है एक और मजेदार कहानी के साथ, तब तक के लिए आप सभी से, जय श्री राधे कृष्णा



