आखिर ऐसा क्यों?
यह भारत का एक लौता मंदिर है, जहा भगवान का असली रूप, साल मे एक दिन दिखता है, बाकी पूरे साल मूर्ति को, चन्दन की मोटी पर्त के साथ, ढककर रखा जाता है, आखिर ऐसा क्यों, चलिए इसके पीछे की कहानी को समझते है, यह कहानी छुपी है,
भगवान विष्णु के सबसे उग्र अवतार नरसिंह से, हिरण्यकशिपु के वध के बाद भी, भगवान नरसिंह का क्रोध , और उग्र ताप सांत नही हो रहा था, उनके इस ताप से पूरा संसार जलने लगा, भक्त प्रहलाद और अन्य देवताओ की प्रार्थना पर,
नरसिंह ने इस सिम्हाचलम पर्वत पर, स्थाई रूप से वास किया, ताकी उनका ताप सांत हो सके, लेकिन उनका यह विशाल और उग्र रूप, सदियो तक इस पर्वत पर रहा, और समय के अनुसार मिट्टी और पर्वत से नीचे ढक गया,
सदियों बाद आंध्रप्रदेश के राजा पूरूरवा को, स्वयं नरसिंह देव ने सपने मे दर्शन दिया, भगवान ने उसे बताया, मेरी मूर्ति इस पहाड के ऊपर, नीचे मिट्टी मे दबी हुई है, और उसे निकालकर स्थापित करने को कहा, इसके अगले ही दिन राजा ने उस मूर्ति की खोज करना प्रारंभ किया,
और उस मूर्ति को निकालकर स्थापित किया, तब देवता ने उसे आग्या दी, मूझे हमेशा चंदन की मोटी परत से ढककर रखना, और साल मे केवल एक बार मेरा असली रूप दिखेगा, और इसी लिए, सदियों से यह परंपरा चली आ रही है,
पूरे तीन सौ चौंसठ दिन भगवान का विग्रह, चंदन से ढका रहता है, और अक्षय तृतीया के दिन सारा चंदन उतारा जाता है, और सभी भक्तों को कुछ घंटों के लिए, भगवान के असली संयुक्त स्वरूप वराह लक्ष्मी के दर्शन होते है,
इस दुर्लभ दर्शन के लिए, लाखो भक्त जमा होते है, इसके तुरंत बाद मूर्ति को, चंदन की मोटी परत से ढक दिया जाता है, ये रहस्यमय धाम है, श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर, जो आंधप्रदेश के विशाखापट्टनम शहर से लगभग, सोलह किलोमीटर दूर, सिम्हाचलम पर्वत पर स्थित है, एक बार कमेंट मे, जय नरसिंह देव जरूर लिखे,
