सृष्टि की उत्पत्ति.....
आज हम एक ऐसी यात्रा शुरू करने जा रहे है, जिसे सुनकर आपका हृदय विस्मय से भर जाएगा, और आत्मा गर्व से,यह कोई सामान्य कथा नही, यह सनातन धर्म का वह अनंत प्रकाश है, जिसने करोडो वर्षो से इस ब्रह्मांड की धडकनो को दिशा दी है,
आज हम उस कथा को समझेंगे, जिसकी जडे समय की सीमाओ से परे है, जिसका आरंभ सृष्टि के प्रथम कम्पन से होता है, जब न दिन था, न रात, न आकाश था, न पृथ्वी, केवल एक गहन मौन था,
जिसमे नारायण की दिव्य चेतना शांति से विद्यमान थी, और फिर एक क्षण ऐसा आया, जब वह शांत चेतना धडकने लगी, जिस स्पंदन से ब्रह्मांड की पहली तरंग जन्मी, वही तरंग आगे चलकर बनी, क्षीर सागर, और उन्ही के मध्य प्रकट हुए,
चार मुखो वाले ब्रह्मा, जिन्होने पहली बार कहा ,सृष्टि प्रारंभ हो, लेकिन यह तो बस शुरुआत है, हम इस श्रृंखला मे आपको केवल पुराण नही बताएंगे, बल्कि वह रहस्य खोलेंगे जो युगो युगो से छुपे है, वह घटनाएं जिनपर लोग आज भी विश्वास नही कर पाते,
और वे सत्य, जिनकी गहराई अकल्पनीय है, पृथ्वी कैसे बनी, प्रलय कैसे होती है? देवता कहा से आए हैं? युग कैसे बदलते हैं? रामायण की शुरुआत असल मे कहां से हुई? आदि और भी चीजो को समझेंगे, यह सिर्फ रामायण नहीं,
यह सम्पूर्ण सनातन धर्म की वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और ऐतिहासिक गाथा है, एक ऐसा सफर, जो आपको समय के आर–पार ले जाएगा, जहा हर दृश्य सत्य है, हर शब्द प्रमाणित, और हर रहस्य आपको भीतर तक हिला देगा,
तो तैयार हो जाइए, हम शुरू करने वाले है, वह यात्रा जो ब्रह्मांड की उत्पत्ति से शुरू होकर, सतयुग, त्रेता, द्वापर, और अंततह कलियुग के उदय तक ले जाएगी, अब शुरू करते है,
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे शून्य था, पूरा अंधकार मे डूबा था,
ना पृथ्वी जैसा कोई ग्रह, और ना ही अन्य किसी प्रकार का सोर्स था, केवल एक ही सत्ता विद्यमान थी, वो थे नारायण, जिसका अर्थ होता है, जो जल मे निवास करता है, लेकिन उस समय तो जल भी नहीं था, तो प्रश्न उठता है,
फिर नारायण जल मे कैसे थे, यही से एक रहस्य शुरू होती है, जब भगवान विष्णु ने, परम चेतना से सृष्टि रचना का विचार किया, तभी उनकी ऊर्जा से पहला जल उत्पन्न हुआ, जिसे कहा गया, क्षीरसागर, यह वही जल था,
जिसमे नारायण अनंत शेष पर शयन करते है, यह शाब्दिक नही, बल्कि दिव्य सतोगुणीय जल का महासागर है, क्षीर सागर भौतिक पृथ्वी पर नही, बल्कि अनंत ब्रह्मांड के महान लोको मे स्थित है, जिसे समानतह विष्णु लोक, गोलोक, वैकुंठ, माना जाता है, जब भगवान विष्णु शेष पर योगनिद्रा में स्थित होते है,
और वही से अगले ब्रह्मांडीय चक्र की योजना बनाते हैं, यह योगनिद्रा साधारण नींद नही, सृष्टि-रचना की गहन मानसिक अवस्था है, जहां भगवान संपूर्ण ब्रह्मांड की योजना बनाते हैं, जब दिव्य समय पूरा हुआ, विष्णु भगवान की नाभि से एक चमकदार ऊर्जा तरंग निकली,
जो धीरे-धीरे एक स्वर्णिम कमल में परिवर्तित हुई, यह कमल कोई फूल नहीं, बल्कि एक पूरा ब्रह्मांडीय केंद्र था, कमल के केंद्र मे पहली बार एक चेतना प्रकट हुई, धीरे-धीरे वह चेतना एक रूप मे बदल गई, वह रूप था, चार मुखो वाले ब्रह्मा जी का, जो स्वयं को अचानक एक विराट, असीम अनंत सागर के मध्य, एक कमल पर बैठे हुए पाते है,
ब्रह्मा जी को न यह पता था, कि वे कौन है, न यह कि वे कहा है, और उन्हे क्या कार्य करना है, इसके बाद उन्होने, कमल के नीचे उतरने की कोशिश की, जब सैकड़ो वर्षो तक नीचे जाते रहे, पर अंत नहीं मिला, और वे वापस ऊपर लौट आए,
तभी उन्होने वहीं तपस्या करना शुरू किया, उसी समय एक आकाशवाणी हुई, तप तप, इसके बाद उन्होने दस हजार वर्ष तक तपस्या किया, जब उनकी चेतना खुली, तभी आकाश मे चार वेदो के स्वर प्रकट हुए, जिसे रिग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, कहा जाता है,
इन वेद-स्वरो से ब्रह्मा जी को, सृष्टि-रचना का ज्ञान प्राप्त हुआ, तप के बाद ब्रह्मा जी को एहसास हुआ, उनके नीचे जो अनंत जल है, वह क्षीर सागर है, जिस कमल पर वे बैठे हैं, वह विष्णु की नाभि से निकला है, और क्षीर सागर मे, अनंत शेष पर जो विश्राम कर रहे है,
वही है भगवान विष्णु, उनके आदि पिता, ब्रह्मा जी ने पहली बार विष्णु को देखा, और प्रणाम किया, फिर विष्णु भगवान बोले, हे ब्रह्मा, तुम सृष्टि के रचयिता बनोगे, मेरे संकेत पर प्राणियो का निर्माण करो, यही क्षण था, जब सृष्टि-चक्र शुरू होता है,
ग्यान प्राप्त करने के बाद, ब्रह्मा जी ने रचना शुरू की ही थी, तभी अचानक भगवान विष्णु जी की योगनिद्रा गहरी होने लगी, उनके भीतर से असीम ऊर्जा उठने लगी, जैसे ब्रह्मांड में किसी महान शक्ति का आवाहन हो रहा हो, वह शक्ति की उर्जा ऐसी थी,
जैसे करोडो देवताओ की सामूहिक शक्ति हो, ब्रह्मा जी ने अभी अभी सृष्टि की संरचना करना शुरू ही किया था, तभी इस अद्भुत दृश्य को देखकर आश्चर्यचकित रह गए, उन्होंने पूछा, हे प्रभु, ये कौन-सी शक्ति है, जो आपके भीतर से प्रकट हो रही है,
विष्णु मुस्कुराए, और बोले, ब्रह्मा जी यह शक्ति मेरी नही, यह अनंत सनातन शक्ति है, जिसे संसार मे शिव के नाम से जाना जाएगा, विष्णु के हृदय से एक दिव्य प्रकाश निकला, यह प्रकाश साधारण नही था, यह वही प्रकाश था जो आज भी, हर मंत्र मे, हर यज्ञ मे, हर कण मे, हर प्राण मे विद्यमान है,
वह दिव्य प्रकाश से ओम की ध्वनि निकली, वह ध्वनि इतनी शक्तिशाली थी, जिससे अनगिनत आकाशगंगाए कांप उठी, वह ज्योति धीरे-धीरे एक रूप लेने लगी, और उसी ज्योति से प्रकट हुए, एक विराट स्वरूप भगवान महादेव का, जो गले में सर्प, जटा में गंगा, माथे पर चंद्रमा, और नेत्रो में संपूर्ण ब्रह्मांड का तांडव,
विष्णु जी ने ब्रह्मा जी से कहा, हे ब्रह्मा, यह है महादेव, समय के स्वामी, विनाश के अधिपति, और सृष्टि मे संतुलन स्थापित करने वाले, ब्रह्मांड तब तक सुरक्षित नही, जब तक शिव न हो, महादेव ने विष्णु से कहा,
विष्णु तुम पालनहार हो। तुमसे ही संसार जीवित है, मेरी शक्ति केवल तभी जगती है, जब तुम पुकारते हो, यही से त्रिदेव की स्थापना हुई, भगवान ब्रह्मा, जो की सृष्टिकर्ता है, भगवान विष्णु, जो की पालनहार है, और भगवान शिव, संहारक,
इसी के बाद सृष्टि का वास्तविक क्रम शुरू हुआ।
परम पिता ब्रह्मा ने, सृष्टि की रचना करते समय, पूर्व काल मे,
सबसे पहले ब्रह्मा जी ने पाँच तत्व बनाए, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, फिर सृष्टि के घटक बनाए,
दिन–रात,, दिशा, काल, नक्षत्र, ग्रह, जलचर, वनस्पति, पशु, सभी कुछ बनाया, लेकिन सृष्टि तब तक पूरी नहीं थी, क्योंकि संरक्षण और संहार करने वाले, जीव अभी उत्पन्न नही हुए थे, तभी ब्रह्मा जी के मन से मनस पुत्रो ने जन्म लिया,
जो थे, मरिचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अंगिरा, वशिष्ठ, भृगु, नारद, ये महान ऋषि भविष्य में, देवताओं, दानवों और मनुष्यों की जातियों के स्तंभ बनने वाले थे, मनस पुत्रों के जन्म से सृष्टि की नींव तो रखी जा चुकी थी… लेकिन ब्रह्मांड अभी भी खाली था।
जीवन था, पर जीवन को आगे बढ़ाने वाले ‘कुल’ अभी उत्पन्न नहीं हुए थे। सृष्टि का बड़ा उद्देश्य — ‘संरक्षण, विस्तार और संतुलन’ अब भी अधूरा था।” इसलिए ब्रह्मा जी ने सृष्टि के अगले चरण की शुरुआत की। ब्रह्मा जी चाहते थे, की अब मानव और अन्य जीवों के कुल आगे बढ़ाने होंगे,
लेकिन समस्या यह थी, मनस पुत्र केवल ज्ञान, तप और धर्म में प्रवृत्त थे। लेकिन उन्ही मे से सात को ब्रह्मा जी ने आदेश दिया, की आप सभी जीवन को और इस सृष्टि को जीवांत रखने के लिए, संतान की उत्पत्ति करो, इसके बाद सभघ ने परम पिता ब्रह्मा जी आग्या को स्वीकार किया,
साथ ही यहा ब्रह्मा जी के शरीर से दो रूप उत्पन्न हुए, जिसमे पहला रूप था, मनु का, जो की प्रथम मनुष्य के जनक माने जाते है, और दूसरा रूप था, शतरूपा का, इन्हें भी मानवता की माता कहा जाता है, और इन्ही से मनुष्य की उत्पत्ति की शुरुआत हुई थी,
इधर ब्रह्मा जी के, मनस पुत्रों की संतानो ने विवाह किया, और इसके बाद सृष्टि की विभिन्न जातिया बनने लगी, मरिचि के पुत्र कश्यप से, देवो की उत्पत्ति हुई, और असुरों, दानवों, नागों, गरूडो, और यक्षो का सृजन शुरू हुआ, भृगु के पुत्र शुक्राचार्य हुए,
जो सम्पूर्ण दानवो के गुरु बने, और असुर वंश का विस्तार किया, पुलस्त्य के दो पुत्र हुए, अगस्थ्य और विश्रवा, आगे चलकर इन दोनों पुत्रों से, राक्षस और देव दोनो की उत्पत्ति हुई, और मनु शतरूपा से, मानव समाज, नगर संस्कृति, की नीव रखने लगी,
इन सभी के सहयोग से सृष्टि प्रारंभिक रूप से व्यवस्थित हो गई थी, यहा सभी जातियां धीरे धीरे फैलने लगी, और अपना जीवन यापन करने लगी, अभी ठीक से संतुलन स्थिर नही हुआ था, उसी समय सबसे महान रिषी मे एक, कश्यप ने अदिति से विवाह किया,
अदिति प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। दक्ष पृथ्वी पर राज करने वाले देव सम्राट जैसे थे, अदिति अत्यंत तेजस्वी, धर्मपरायण, साथ ही बेहद खूबसूरत थी, उसका स्वभाव बहुत ही सरल था, जब दक्ष ने अदिति का विवाह कश्यप से साथ किया,


